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Monsoon Climate

Monsoon Climate

मानसूनी जलवायु
- मानसून शब्द कि उत्पति अरबी भाषा के मौसिम शब्द से हुई है  जिसका शाब्दिक अर्थ होता है -- हवा कि दिशा में पूर्ण परिवर्तन ।
- इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम अरब प्रायदीव पर चलने वाली उन हवाओ के लिए किया गया था ,जो 06 महीने उतर -पूर्व से तथा 06 महीने दक्षिण -पश्चिम से चलती थी ।
मानसून दो प्रकार के होते है ---
1.उतरी -पूर्वी मानसून :-
इसमें हवाए स्थल से सागर कि और चलती है ।
2.दक्षिण -पश्चिम मानसून :-
इसमें हवाए सागर से स्थल कि और चलती है ।
भारत में ऋतुए:-
1.शीत ऋतु -- 16.दिस.से 15.मार्च
२.ग्रीष्म ऋतु -- 16 मार्च से 15 जून    उतरी पूर्वी मानसून
३.वर्षा ऋतु -- 16 जून से 15 सित.
4.शरद ऋतु - 16 सित. से 15 दिस. द.प.मानसून


1.शीत ऋतु :-


शीत ऋतु में भारत के उतरी पश्चिमी भागो में अत्यधिक ठण्ड पड़ती है ।अत: वहा पर उच्च वायुदाव का केंद्र बन जाता है । जब कि हिंद महासागर का जल गर्म होने के कारण वहा निम्न वायुदाब का केंद्र बन जाता है ।
अत: हवाए उतरी पश्चिमी उच्च वायुदाब से हिंद महासागर निम्न वायुदाब कि और चलती है
चुकी ये हवाए स्थल भाग से आती है ।अत: ये शुष्क होती है और इनसे वर्षा नहीं होती ।
--परन्तु जब ये हवाए बंगाल कि खाड़ी को पर करती है तो आर्द्रता ग्रहण कर लेती है जिसमे तमिलनाडु या कोरोमंडल तट में वर्षा होती है ।
-- तौटते हुए मानसून से वर्षा प्राप्त करने वाला राज्य तमिलनाडु है
मावठ :- राजस्थान में शीतकाल में होने वाली वर्षा को मावठ कहते है ।
मावठ का कारण :-
जनवरी -फरवरी के महीने में मुमध्य सागर पर विक्षोभ व चक्रवातो का जन्म होता है
इन विक्षोभ व चक्रवातो को जेट स्ट्रीम इरान,इराक,अफगानिस्तान,पाकिस्तान,होती हुई भारत लाती है ।
चुकी ये विक्षोभ पश्चिम से आते है इसलिए इन्हें पश्चिमी विक्षोभ कहा जाता है ।
-- इन विक्षोभो से उतरी भारत जैसे - जम्मू कश्मीर,पंजाब,हरियाणा,व राजस्थान में वर्षा होती है ।
-- मावठ में वर्ष कि बूंदों को "गोल्डन ड्रोप्स या सुनहरी बुँदे " कहा जाता है । क्यों कि ये बुँदे गेंहू कि फसल के लिए लाभदायक होती है


2.ग्रीष्म ऋतु :--


--21 मार्च के बाद सूर्य उतरायण होना प्रारम्भ होता है अत: उतरी गोलार्द्ध में गर्मिया बढ़ने लग जाती है
-- भारत के उतर पश्चिमी भागो में भीषण गर्मी पड़ती है व लू (गर्म हवाए) चलती है ।
-- अप्रैल व मई के महीनो में भीषण गर्मी पड़ने के बावजूद भी उतर -पश्चिमी भागो में निम्न वायुदाब सक्रीय नहीं हो पता व भारत में मानसून प्रवेश नहीं कर पता क्यों कि :- उपोष्ण पश्चिमी जैट स्ट्रीम कि दक्षिणी शाखा भारत के ऊपर से होकर गुजरती है जिसके कारण भारत के उतर पश्चिमी भागो के उपरी वायुमंडल में प्रति चक्रवात कि दशाए बनती है जिनके कारण हवाए ऊपर से निचे बैठती है ।
-- ये हवे निचे से गर्म होकर ऊपर उठाने वाली हवाओ को उड़ने से रोकती है । और निम्न वायुदाब सक्रीय नहीं हो पता ।
मानसून पूर्व वर्षा :--
मानसून के पूर्व होने वाली वर्षा को मानसून पूर्व वर्षा कहा जाता है ।
कारण :-- स्थलीय गर्म हवाओ व सागरीय आर्द्र हवाओ के मिलाने से तटीय भागो पर तुफानो कि उत्पति होती है और वर्षा प्रारम्भ हो जाती है
 क्षेत्रीय नाम :- पश्चिमी बंगाल -- कालू बैशाखी
केरल --- आम्र वर्षा या मेंगो सवार
कर्नाटक --- कोफ़ी कि वर्षा व चेरी ब्लोसम कि वर्षा
असम --- चाय कि वर्षा


3.वर्षा ऋतु :--


-- 15 जून के बाद जेट स्ट्रीम धीरे-धीरे उतर कि और खिसकना प्रारम्भ करती है तथा बाद में एक झटके के साथ उतर कि और विस्थापित हो जाती है तह इसकी दक्षिणी शाखा लुप्त हो जाती है ।
--- अब भारत के उतर -पश्चिमी भागो के उपरी वायुमंडल में चक्रवतीय दशाये बनती है जिसके कारण हवाए तेजी से ऊपर कि और खिचती है और निम्न वायुदाब से केंद्र सक्रीय हो जाता है ।
इस निम्न वायुदाब के केंद्र कि और हिंदमहासागर से आर्द्र हवाए धमाकेदार वर्षा करती हुई भारत में प्रवेश करती है । इसे मानसून का विस्फोट कहा जाता है  ।
दक्षिणी -पश्चिमी मानसूनी हवाए :-
--विषुवत रेखा के 5' उतरी व 5'दक्षिण में एक शांत पेटी पी जाती है,जिसे I.T.C.Z (intra tropic conversion zore)- अंतर्राउष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र , कहा जाता है ।
--इस पेटी के अन्दर पश्चिम से पूर्व कि और विषुवत रेखीय पछुवा पवने चलती है ।
यह सूर्य के उतरायण होने पर उतर कि और तथा दक्षिणायन होने पर दक्षिण कि और खिकक जाती है ।
-- जून के महीने में इस पेटी का विस्तार भारत में ३०'उतरी अक्षांशो तक हो जाता है ।
विस्तार हो जाने के बाद इस पेतिके अन्दर चलने वाली विषुवत रेखीय पछुआ पवने व दक्षिणी पूर्वी व्यापारिक पवने दक्षिण पश्चिम मानसूनी हवाओ के रूप में भारत में प्रवेश करती है,इसे दक्षिणी -पश्चिमी मानसून कहा जाता है ।
-- भारत का प्रायद्वीपीय भाग त्रिभुजाकार होने के कारण यह मानसून दो शाखों में बट जाता है
1.अरब सागरीय शाखा
2.बंगाल कि खाड़ी कि शाखा

1.अरब सागरीय शाखा :--
इसकी तीन उपशाखाए होती है  --

(I)पहली शाखा :- यह उपशाखा पश्चिमी घाट से टकराती है और पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढालो पर भारी वर्षा करती है । जब यह शाखा पश्चिमी घाट के पूर्वी ठालो के सहारे निचे उतरती है तो गर्म हो जाती है और इसमें वर्षा लेन कि क्षमता नहीं रहती ,इसलिए पश्चिमी घाट का पूर्वी क्षेत्र वर्षा से अछूता रह जाता है. जिसे वृष्टि छाय प्रदेश कहा जाता है ।
-- इस उपशाखा से भारत में सर्वप्रथम केरल राज्य में मानसून प्रवेश करता है ।
(II)दूसरी शाखा :=
यह उपशाखा नर्मदा व ताप्ती कि घाटी से होती हुई छोटा नागपुर कि पठार तक पहुचती है जहा यह बंगाल कि खाड़ी कि शाखा से मिल जाती है ।
-- इस स्थान पर चक्रवतीय वर्षा होती है ।
(III)तीसरी शाखा :-
यह उपशाखा गुजरात के बाद अरावली के सहारे -सहारे आगे बढती है और हिमाचल प्रदेश में शिवालिक श्रेणी से टकरा जाती है और वहा पर भारी वर्षा होती है ।
-- इस शाखा से राजस्थान में केवल दक्षिणी जिलो में जहा अरावली कि उचाई अधिक है ,वहा वर्षा हो पाती है
जैसे:- उदयपुर,सिरोही
-- भारत में सर्वाधिक  वर्षा "अरब सागरीय शाखा से होती है
-- राजथान में सर्वाधिक वर्षा "बंगाल कि खाड़ी " से होती है
2.बंगाल कि खाड़ी कि शाखा :-

यह भी 3 उपशाखाओ में बट जाती है
I.पहली उपशाखा
यह उपशाखा "अरकान योगा श्रेणी से टकराकर म्यांमार में चली जाती है ।
II.दूसरी उपशाखा :-
यह उपशाखा भारत के उतरी पूर्वी राज्यों में जाती है।
-- यह शाखा मेघालय में गारो,खासी,जयंतिया कि पहाडियों में प्रवेश कर जाती है और भारी वर्षा करती है ।
-- खासी पहाडियों में स्थित "मोसिनराम" विश्व का सर्वाधिक वर्षा करने वाला स्थान है ।
III.तीसरी उपशाखा :-
यह उपशाखा पश्चिम बंगाल,बिहार ,उ.प.दिल्ली,हरियाणा होती हुई राजस्थान में प्रवेश कर जाती है ।
-- इस शाखा के आगे बढ़ने के क्रम में आर्द्रता कि मात्रा कम होती चली जाती है तथा राजस्थान तक आते -आते इसमें नमी कि मात्रा काफी कम रह जाती है ।


मानसून विभंगता


एक वर्षा काल के बाद एक लम्बा शुष्क काल मानसून विभंगता कहलाता है ।
कारण :-
1.अरब प्रायद्वीपीय उच्च वायुदाब का भारत तक विस्तार हो जाना ।
2.जेट स्ट्रींन का पुन: स्थापन ।
3.अलनीनो : - अलनीनो एक गर्म महासागरीय जल धारा है जो दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर उतर से दक्षिण कि ओर चलती है।
-- इस गर्म जलधारा के कारण दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर निम्न वायुदाब बन जाता है ,जो भारत के मानसून को कम करता है ।
-- यह धारा 25 दिस. के आस -पास पैदा होती है इसलिए इसे  child-christ या शिशु -यीशु भी कहा जाता है ।


वर्षा के प्रकार


1.संवहनीय वर्षा :- जब हवाए गर्म होकर ऊपर उठती है तो वह ऊपर जाकर ठंडी हो जाती है ।तथा उनकी सापेक्षिक आर्द्रता बढ़ जाती है और वर्षा प्रारंभ हो जाती है, इसे संवहनीय वर्षा कहते है
उदहारण -- विषुवत रेखीय क्षेत्रो में संवहनीय वर्षा होती है ।
2.पर्वतीय वर्षा :- जब हवाए पर्वतो के सहारे ऊपर उठती है तो वे ठंडी होकर वर्षा करती है ,इसे पर्वतीय वर्षा कहते है ।
उदहारण -- भारत का पश्चिमी घाट   
3.चक्रवातीय वर्षा :-
चक्रवातो से होने वाली वर्षा को चक्रवातीय वर्षा कहते है ।
उदहारण :- छोटा नागपुर का पठार ।
आर्द्रता
-- वायुमंडल में उपस्थित नमी कि मात्रा को आर्द्रता कहा जाता है । यह तीन प्रकार कि होती है ---
1.निरपेक्ष आर्द्रता
2.सापेक्षिक आर्द्रता
3.विशिष्ट आर्द्रता
1.निरपेक्ष आर्द्रता :-
वायुमंडल के प्रति इकाई क्षेत्र में उपस्थित नमी कि मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहा जाता है ।
2.सापेक्षिक आर्द्रता :- किसी निश्चित तापमान पर वायु में उपस्थित आर्द्रता कि मात्रा तथा उसी तापमान पर इस वायु कि आर्द्रता ग्रहण करने कि क्षमता के अनुपात को सापेक्षिक आर्द्रता कहा जाता है ।
--- सापेक्षिक आर्द्रता व तापमान में विपरीत सम्बन्ध होता है ।
सापेक्षिक आर्द्रता *1/तापमान
सापेक्षिक आर्द्रता =निरपेक्ष आर्द्रता /आर्द्रता सामर्थ्य *100
:- सापेक्षित आर्द्रता 100% से ऊपर होने पर ही वर्षा होती है ।
3.विशिष्ट आर्द्रता :-
1000 ग्राम या 1 किलोग्राम वायु में उपस्थित नमी कि मात्रा (ग्राम में ) को विशिष्ट आर्द्रता कहा जाता है ।


4.शरद ऋतु :-


--23 सितम्बर के बाद सूर्य दक्षिणायन होना प्रारंभ हो जाता है । अत: उतरी गोलार्द्ध में सर्दिया तह दक्षिणी गोलार्द्ध में गर्मिया बढ़ने लग जाती है तथा हवाओ कि दिशा बदल जाती है
--- इसे मानसून का लौटना या मानसून का प्रत्यावर्तन काल कहा जाता है ।
--- भारत में न्यूनतम वर्षा "लेह-लद्दाख "क्षेत्र में होती है
--भारत का शीत मरुस्थल लद्दाख को कहा जाता है ।





20 Jun, 2018, 01:28:50 AM